Site icon कारोबार संवाद

तांत्रिक के झांसे में आकर अपनी ही बच्ची की बलि? फिल्म ‘सागवान’ में देखें रूह कंपा देने वाला वो काला सच

IMG-20251230-WA0000.jpg

क्या कोई मां-बाप अपनी ही कलेजे के टुकड़े की जान ले सकते हैं? सुनने में यह नामुमकिन लगता है, लेकिन जब अंधविश्वास का जहर इंसान के दिमाग पर चढ़ता है, तो वह ‘इंसान’ से ‘हैवान’ बन जाता है। SANWALIYA ENTERTAINMENT के बैनर तले बनी फिल्म ‘सागवान’ (Sagwaan) इसी झकझोर देने वाले कड़वे सच को पर्दे पर लाने जा रही है, जिसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी।

वो काली रात और सागवान के जंगल

फिल्म की कहानी राजस्थान के प्रतापगढ़ और धरियावद के उन घने सागवान के जंगलों की याद दिलाती है, जहाँ 2019 में एक ऐसी घटना घटी जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक ढोंगी तांत्रिक अपनी ‘सिद्धियों’ का लालच देकर एक परिवार को इस कदर पागल कर देता है कि वे गड़े हुए धन या सुख-शांति के नाम पर अपनी ही मासूम बच्ची की बलि चढ़ाने को तैयार हो जाते हैं।

रीयल पुलिस अफसर की जुबानी, खौफ की कहानी

इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं इसके लीड हीरो और निर्देशक हिमांशु सिंह राजावत। उदयपुर सीआईडी के इस जांबाज अधिकारी ने अपनी सर्विस के दौरान ऐसी कई फाइलें देखी हैं, जहाँ अंधविश्वास ने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया। राजावत साहब कहते हैं— “पर्दे पर जो आप देखेंगे, वो सिर्फ एक्टिंग नहीं है, वो उस मासूम की चीख है जिसे समाज के अंधविश्वास ने खामोश कर दिया।”

बॉलीवुड के विलेन्स का खौफनाक अवतार

फिल्म में जब सयाजी शिंदे और मिलिंद गुणाजी जैसे दिग्गज कलाकार तांत्रिक शक्तियों और ढोंग का ताना-बाना बुनते हैं, तो थिएटर में सन्नाटा पसर जाता है। फिल्म का संगीत, जिसे ऐकार्थ पुरोहित और कपिल पालीवाल ने तैयार किया है, इस खौफनाक माहौल को और भी गहरा बना देता है। खासकर वो सीन जहाँ मासूमियत और हैवानियत का सामना होता है, उसे देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाए।

सिस्टम और समाज के मुंह पर तमाचा

‘सागवान’ सिर्फ एक थ्रिलर फिल्म नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम और समाज के लिए एक आईना है। यह सवाल उठाती है कि:

क्या आज भी हम इतने पिछड़े हैं कि एक पत्थर या तांत्रिक के कहने पर अपनों का खून बहा देते हैं?

इतिहास रचने को तैयार ‘100% राजस्थानी’ फिल्म

पूरी तरह से राजस्थान के टैलेंट, राजस्थान की लोकेशन्स और राजस्थान की ही सच्ची घटना पर आधारित यह फिल्म जल्द ही आपके नजदीकी सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। सेंसर बोर्ड से UA सर्टिफिकेट मिलने के बाद अब बस इंतजार है उस दिन का, जब ‘सागवान’ समाज की इन बेड़ियों को तोड़ेगी।

अगर आप अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए देखना जरूरी है। यह मनोरंजन कम और एक ‘लाइफ-सेविंग’ वॉर्निंग ज्यादा है।

क्या हमारी पुलिस और कानून इन बंद कमरों और जंगलों में होने वाली ‘बलि’ को रोक सकते हैं?

Exit mobile version