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25 साल बाद मरुधरा की माटी ने ली अंगड़ाई! ‘सागवान’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, राजस्थानी सिनेमा के नए युग का आगाज़ है

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कहते हैं कि अगर इरादे नेक हों और अपनी जड़ों से जुड़ाव सच्चा हो, तो इतिहास खुद-ब-खुद रचा जाता है। करीब ढाई दशक (25 साल) के लंबे इंतजार के बाद राजस्थान की सिने-जगत में एक ऐसी सुहानी सुबह आई है, जिसका नाम है— ‘सागवान’ (Sagwaan)। यह मात्र एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह राजस्थान का, राजस्थान के लिए और राजस्थान के ही हुनरमंद लोगों द्वारा तैयार किया गया एक ‘प्रेम पत्र’ है अपनी संस्कृति के नाम

जयपुर से ADG दिनेश MN का उदयपुर पहुंचे और ट्रेलर लॉन्च करना यह साबित करता है कि फिल्म का विषय कितना महत्वपूर्ण है। यह फिल्म राजस्थानी सिनेमा के पुनर्जन्म के लिए एक ‘मील का पत्थर’ साबित होने वाली है

माटी का हुनर, माटी की कहानी

कई दशकों पहले राजस्थानी सिनेमा का अपना एक सुनहरा दौर था, लेकिन बीच के 24-25 सालों में वह पहचान कहीं खो सी गई थी। ‘सागवान’ ने उस खोए हुए गौरव को फिर से जीवित किया है। इस फिल्म की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसके कलाकार, तकनीक और संगीत—सब कुछ शुद्ध रूप से राजस्थानी है। यह फिल्म साबित करती है कि हमारे पास कहानियों की कमी नहीं है, बस उन्हें सहेजने वाले दिल की जरूरत थी

सेंसर बोर्ड की सराहना: मर्यादा और संस्कार का संगम
आज के दौर में जहाँ सिनेमा अक्सर हिंसा, शोर-शराबे और फूहड़ता की तरफ झुक जाता है, वहीं ‘सागवान’ ने एक साफ़-सुथरी लकीर खींची है। सेंसर बोर्ड ने भी इस फिल्म की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए एक प्रेरणा बताया है। बिना किसी अपशब्द या अश्लीलता के, यह फिल्म एक ऐसी गंभीर कहानी कहती है जिसे आप अपने माता-पिता और बच्चों के साथ बैठकर गर्व से देख सकते हैं।

अंधेरे से उजाले की ओर: एक हाथ मदद का
यह फिल्म सुदूर जंगलों में रहने वाले उन मासूम और सीधे-सादे भाई-बहनों की कहानी है, जो शिक्षा की कमी की वजह से आज भी अंधविश्वास के चंगुल में फंस जाते हैं। ‘सागवान’ उन लोगों का हाथ थामने की एक कोशिश है, जो अज्ञानता के अंधेरे में भटक गए हैं। यह फिल्म डराने नहीं, बल्कि जागरूक करने और एक-दूसरे का सहारा बनने का संदेश देती है

सत्य घटनाओं से प्रेरित एक ‘सीख’

यह फिल्म किसी काल्पनिक दुनिया की नहीं, बल्कि समाज की सत्य घटनाओं से प्रेरित है। यह हमें सिखाती है कि आस्था और विश्वास जहाँ हमें ताकत देते हैं, वहीं अंधविश्वास हमें कमजोर बनाता है। पुलिस अफसर हिमांशु सिंह राजावत और उनकी पूरी टीम ने इस फिल्म के जरिए समाज को एक आईना दिखाया है, जिसमें उम्मीद का उजाला साफ नजर आता है।

एक नई शुरुआत का शंखनाद
‘सागवान’ का आना राजस्थानी सिनेमा के लिए एक ‘मील का पत्थर’ है। यह उन तमाम कलाकारों और फिल्मकारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो अपनी भाषा और संस्कृति में कुछ बड़ा करना चाहते हैं।

जब आप सिनेमाघर जाएं, तो यह सोचकर जाएं कि आप सिर्फ एक फिल्म देखने नहीं जा रहे, बल्कि आप राजस्थान के स्वाभिमान और उसके हुनर को सपोर्ट करने जा रहे हैं।

आखिर क्यों बनानी पड़ी फिल्म? ये है चर्चित फिल्म ‘सागवान’ के पीछे की असली वजह!

जब एक वर्दीधारी अधिकारी (Uniformed Officer) अपनी ड्यूटी छोड़कर कैमरे के पीछे जाता है, तो उसके पीछे कोई मनोरंजन मात्र का शौक नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी सामाजिक टीस होती है।

पुलिस अफसर हिमांशु सिंह राजावत ने अपने करियर में ऐसी कई घटनाएं देखीं, जहाँ मासूम बच्चों की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि उनके माता-पिता या समाज किसी ढोंगी तांत्रिक के जाल में फंसे थे। हिमांशु जी का मानना है कि “पुलिस की चार्जशीट सिर्फ अदालत तक पहुँचती है, लेकिन फिल्म समाज के दिल तक पहुँचती है।” उन्हें लगा कि जब तक यह सच पर्दे पर नहीं आएगा, लोग जागरूक नहीं होंगे।

अंधविश्वास के खिलाफ ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में आज भी तंत्र-मंत्र, डाइन-प्रथा और बलि जैसे अंधविश्वास जड़ें जमाए हुए हैं। पुलिस डंडे के दम पर अपराधी को तो पकड़ सकती है, लेकिन लोगों की ‘सोच’ को नहीं बदल सकती। फिल्म ‘सागवान’ बनाने का सबसे बड़ा मकसद उस ‘सोच’ पर वार करना है। यह फिल्म समाज को यह बताने के लिए बनाई गई है कि आस्था और अंधविश्वास के बीच एक बहुत पतली लकीर होती है, जिसे पार करना जानलेवा हो सकता है।

खाकी का मानवीय चेहरा दिखाना

अक्सर फिल्मों में पुलिस को या तो बहुत बुरा दिखाया जाता है या फिर सुपरह्यूमन। हिमांशु सिंह राजावत इस फिल्म के जरिए यह दिखाना चाहते थे कि एक पुलिस वाला भी इंसान होता है। वह भी समाज की बुराइयों को देखकर टूटता है, उसे भी गुस्सा आता है और वह भी सिस्टम की सीमाओं में बंधा होता है। उन्होंने इस फिल्म के जरिए पुलिसिंग की असली चुनौतियों और मानसिक दबाव को पेश किया है।

राजस्थान के टैलेंट और मिट्टी को मंच देना

फिल्म के निर्माताओं और राजावत साहब का एक उद्देश्य यह भी था कि राजस्थान की जो सच्ची कहानियाँ हैं, उन्हें राजस्थानी कलाकारों के जरिए ही दुनिया के सामने लाया जाए। बॉलीवुड अक्सर इन कहानियों को ‘मसाला’ बनाकर पेश करता है, लेकिन ‘सागवान’ में इसे उसी कच्चे और असली (Raw & Real) रूप में दिखाया गया है जैसा वह असल में है।

हिमांशु सिंह राजावत के शब्दों में कहें तो— “मैंने अपराधी को तो जेल भेज दिया, लेकिन उस सोच का क्या जो नए अपराधी पैदा कर रही है? ‘सागवान’ उस सोच को जेल भेजने की एक कोशिश है।”

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